🌺. देवी गंगा और शांतनु की कथा 🌺
हिन्दू धर्म में गंगा को सबसे पवित्र व पूजनीय नदी माना गया है। गंगा के संबंध में अनेक धर्म ग्रंथों में कई कथाएं पढ़ने को मिलती है। महाभारत के सबसे प्रमुख पात्र भीष्म भी गंगा के ही पुत्र थे। तो आइये जानते हैं गंगा और शांतनु से जुड़ी कथा के बारे में।
प्राचीन समय में इक्ष्वाकु वंश में राजा महाभिष थे। उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञ करके स्वर्ग लोक प्राप्त किया था। एक दिन बहुत से देवता और राजर्षि, जिनमें महाभिष भी थे, ब्रह्माजी की सेवा में आए। वहां गंगा भी उपस्थित थीं। तभी हवा के वेग से गंगा के वस्त्र शरीर पर से खिसक गए। वहां उपस्थित सभी लोगों ने अपनी आंखें नीची कर ली, मगर राजा महाभिष गंगा को देखते रहे। जब परमपिता ब्रह्मा ने ये देखा तो उन्होंने महाभिष को मृत्युलोक पर जन्म लेने का श्राप दिया और कहा कि गंगा के कारण ही तुम्हारा अप्रिय होगा और जब तुम उस पर क्रोध करोगे तब इस श्राप से मुक्त हो जाओगे।
ब्रह्मा के श्राप के कारण राजा महाभिष ने पूरूवंश में राजा प्रतीप के पुत्र शांतनु के रूप में जन्म लिया। एक बार राजा शांतनु शिकार खेलते-खेलते गंगा नदी के तट पर आए। यहां उन्होंने एक परम सुदंर स्त्री (वह स्त्री देवी गंगा ही थीं) को देखा। उसे देखते ही शांतनु उस पर मोहित हो गए। शांतनु ने उससे प्रणय निवेदन किया। उस स्त्री ने कहा कि मुझे आपकी रानी बनना स्वीकार है, लेकिन मैं तब तक ही आपके साथ रहूंगी, जब तक आप मुझे किसी बात के लिए रोकेंगे नहीं, न ही मुझसे कोई प्रश्न पूछेंगे। ऐसा होने पर मैं तुरंत आपको छोड़कर चली जाऊंगी। राजा शांतनु ने उस सुंदर स्त्री का बात मान ली और उससे विवाह कर लिया।
विवाह के बाद राजा शांतनु उस सुंदर स्त्री के साथ सुखपूर्वक रहने लगे। समय बीतने पर शांतनु के यहां सात पुत्रों ने जन्म लिया, लेकिन सभी पुत्रों को उस स्त्री ने गंगा नदी में डाल दिया। शांतनु यह देखकर भी कुछ नहीं कर पाएं क्योंकि उन्हें डर था कि यदि मैंने इससे इसका कारण पूछा तो यह मुझे छोड़कर चली जाएगी। आठवां पुत्र होने पर जब वह स्त्री उसे भी गंगा में डालने लगी तो शांतनु ने उसे रोका और पूछा कि वह यह क्यों कर रही है?
उस स्त्री ने बताया कि मैं देवनदी गंगा हूं तथा जिन पुत्रों को मैंने नदी में डाला था वे सभी वसु थे जिन्हें वसिष्ठ ऋषि ने श्राप दिया था। उन्हें मुक्त करने लिए ही मैंने उन्हें नदी में प्रवाहित किया। आपने शर्त न मानते हुए मुझे रोका। इसलिए मैं अब जा रही हूं। ऐसा कहकर गंगा शांतनु के आठवें पुत्र को लेकर अपने साथ चली गई।
(‘आपने वशिष्ठ ऋषि के बारे में सुना होगा। वशिष्ठ अपने आश्रम में रहते थे और उनके पास नंदिनी नाम की एक गाय थी, जिसमें दैवी गुण थे। एक दिन, आठों वसु अपनी पत्नियों के साथ विमानों में बैठकर पृथ्वी पर छुट्टियां मनाने गए। वे वशिष्ठ के आश्रम से गुजरे और उन्होंने अविश्वसनीय दैवी गुणों वाली नंदिनी गाय को देखा। एक वसु प्रभास की पत्नी ने कहा, ‘मुझे वह गाय चाहिए।’ प्रभास ने बिना सोचे-समझे कहा, ‘चलो, वह गाय लेकर आते हैं।’
एक-दो वसुओं ने कहा, ‘मगर यह हमारी गाय नहीं है। यह एक ऋषि की गाय है। हमें इसे नहीं लेना चाहिए।’ प्रभास की पत्नी ने जवाब दिया, ‘कायर ही बहाने खोजते हैं। तुम गाय नहीं ला सकते इसलिए धर्म को बीच में ला रहे हो।’ प्रभास को अपनी मर्दानगी याद आ गई और उसने अपने साथियों की मदद से गाय को चुराने की कोशिश की। जैसे ही वशिष्ठ को पता चला कि उनकी प्रिय गाय को चुराया जा रहा है, उन्होंने वसुओं को पकड़ लिया और बोले, ‘ऐसा काम करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई। तुम लोग अतिथि बन कर आए। हमने तुम्हारी इतनी खातिरदारी की और तुम मेरी ही गाय को चुराना चाहते हो।’
उन्होंने वसुओं को श्राप दे दिया - ‘तुम लोग इंसानों के रूप में जन्म लोगे और उसके साथ आने वाली सभी सीमाओं में बंध कर रहोगे। तुम्हारे पंख कतर दिए जाएंगे, जिससे तुम उड़ नहीं सकोगे। तुम्हें इस धरती पर जीवन बिताना होगा। तुम्हें बाकी इंसानों की तरह पैदा होना और मरना होगा।’ जब वसुओं को पता चला कि मैं (गंगा) देवलोक में हूं और मुझे इंसान के रूप में धरती पर जाने का श्राप मिला है, तो आठों वसुओं ने मुझसे प्रार्थना की - ‘कुछ ऐसा कीजिए कि हम आपके गर्भ से पैदा हों। और इस धरती पर हमारा जीवन जितना हो सके, उतना छोटा हो।’)
गंगा जब शांतनु के आठवे पुत्र को साथ लेकर चली गई तो वे बहुत उदास रहने लगे। इस तरह थोड़ा और समय बीता। शांतनु एक दिन गंगा नदी के तट पर घूम रहे थे। वहां उन्होंने देखा कि गंगा में बहुत थोड़ा जल रह गया है और वह भी प्रवाहित नहीं हो रहा है। इस रहस्य का पता लगाने जब शांतनु आगे गए तो उन्होंने देखा कि एक सुंदर व दिव्य युवक अस्त्रों का अभ्यास कर रहा है और उसने अपने बाणों के प्रभाव से गंगा की धारा रोक दी है।
यह दृश्य देखकर शांतनु को बड़ा आश्चर्य हुआ। तभी वहां शांतनु की पत्नी गंगा प्रकट हुई और उन्होंने बताया कि यह युवक आपका आठवां पुत्र है। इसका नाम देवव्रत है। इसने वसिष्ठ ऋषि से वेदों का अध्ययन किया है तथा परशुरामजी से इसने समस्त प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को चलाने की कला सीखी है। यह श्रेष्ठ धनुर्धर है तथा इंद्र के समान इसका तेज है। देवव्रत ही आगे जाकर भीष्म कहलाए।
जय मां गंगे! हर हर गंगे!!